रिपोर्ट: धर्मेंद्र सिंह
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन से जुड़ी एक अहम जानकारी सामने आई है, जिसमें 2 सितंबर 1994 को मसूरी के झूला घर स्थित शहीद स्थल पर हुए गोलीकांड में शहीद हुए पुलिस अधिकारी उमाकांत त्रिपाठी को शहीद का दर्जा दिए जाने की पुष्टि हुई है। इस जानकारी के सामने आने के बाद राज्य आंदोलनकारियों में खुशी के साथ-साथ सिस्टम की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी भी देखने को मिली है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन 1994 के दौरान 2 सितंबर 1994 को मसूरी में पृथक राज्य की मांग कर रहे निहत्थे आंदोलनकारियों पर पुलिस फायरिंग की गई थी। इस घटना में 6 आंदोलनकारियों के साथ पुलिस अधिकारी उमाकांत त्रिपाठी की भी मृत्यु हो गई थी।
जानकारी के अनुसार, भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा वर्ष 1995 में ही उमाकांत त्रिपाठी को शहीद का दर्जा दे दिया गया था और दिल्ली स्थित शिलापट्ट पर उनका नाम भी दर्ज है।
हालांकि, हैरानी की बात यह है कि पिछले 32 वर्षों तक इस निर्णय की जानकारी न तो राज्य सरकार, न पुलिस विभाग और न ही उनके परिजनों तक पहुंच पाई।
राज्य निर्माण आंदोलनकारी रविंद्र जुगराण ने प्रेस वार्ता में बताया कि बीते दो दशकों से लगातार उमाकांत त्रिपाठी को शहीद का दर्जा दिलाने के प्रयास किए जा रहे थे। लेकिन अब पता चला कि यह दर्जा तो 1995 में ही दिया जा चुका था।
उन्होंने इसे शासन-प्रशासन की गंभीर लापरवाही करार दिया।
राज्य आंदोलनकारी जयप्रकाश उत्तराखंडी ने बताया कि 1994 की घटना के दौरान उमाकांत त्रिपाठी ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का विरोध किया था। इसी दौरान उन्हें गोली लगी और बाद में अस्पताल में उनका निधन हो गया।
आंदोलनकारियों ने राज्य सरकार से मांग की है कि:
आंदोलनकारियों ने पिछले 32 वर्षों से इस पीड़ा को झेल रहे परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की और उनसे इस देरी के लिए क्षमा भी मांगी।
