देहरादून के प्रसिद्ध झंडा मेला में जहां एक ओर आस्था और उत्सव का माहौल देखने को मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर मेले में छोटे बच्चों के काम करते नजर आने से बाल श्रम को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
मेले में बच्चों के काम करने पर चिंता
मेले के दौरान कई स्थानों पर बच्चों को दुकानों और स्टॉल्स पर काम करते देखा गया। इसको लेकर सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों ने चिंता जताई है कि कहीं यह बाल श्रम का मामला तो नहीं।
बाल संरक्षण आयोग की प्रतिक्रिया
इस मामले पर बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष गीता खन्ना ने कहा कि—
“अक्सर जो बच्चे मेले में काम करते दिखाई देते हैं, वे उन्हीं परिवारों के होते हैं जो वहां दुकान या स्टॉल लगाते हैं। कई बार बच्चे छुट्टी के दिन अपने पिता या भाई के साथ आ जाते हैं।”
उन्होंने यह भी बताया कि जांच के दौरान बच्चे अक्सर यही कहते हैं कि वे सिर्फ परिवार के साथ मदद के लिए आए हैं।
बाल श्रम या मजबूरी?
हालांकि, यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या यह पूरी तरह पारिवारिक मदद है या आर्थिक मजबूरी के कारण बच्चों को काम करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि कई परिवार आर्थिक तंगी के चलते बच्चों को साथ लाने को मजबूर होते हैं।
समाधान की जरूरत
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि:
- केवल कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है
- जरूरत है जागरूकता अभियान चलाने की
- आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सहायता और समर्थन देने की
ताकि बच्चे शिक्षा से जुड़ सकें और उनका भविष्य सुरक्षित हो सके।
