देहरादून। उत्तराखंड में बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों को देखते हुए राज्य सरकार अब ग्लेशियर झीलों की निगरानी और आपदा प्रबंधन प्रणाली को और मजबूत करने में जुट गई है। मुख्य सचिव ने इस दिशा में अहम बैठक करते हुए अधिकारियों को कई जरूरी निर्देश दिए।
बैठक में ग्लेशियर झीलों की प्रभावी निगरानी पर विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning System) के उपकरण जल्द से जल्द स्थापित किए जाएं, ताकि किसी भी संभावित खतरे से पहले लोगों को सतर्क किया जा सके।
सरकार ने वसुंधरा झील को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में विकसित करने का फैसला लिया है। इसके तहत यहां आधुनिक तकनीकों के माध्यम से जोखिम का आकलन और प्रबंधन किया जाएगा। साथ ही, ग्लेशियर झीलों से जुड़े खतरों को कम करने के लिए वैज्ञानिक मॉडल भी तैयार किया जा रहा है।
बैठक में भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली की भी समीक्षा की गई। अधिकारियों ने बताया कि राज्य में पहले से 169 सेंसर और 112 सायरन स्थापित किए जा चुके हैं, जो आपदा के समय अलर्ट जारी करने में मदद करते हैं।
अर्ली वार्निंग सिस्टम को और मजबूत बनाने के लिए IIT रुड़की के साथ मिलकर काम किया जा रहा है। इसके अलावा, भूकम्प जोखिम न्यूनीकरण के तहत 500 नए सेंसर लगाने की योजना पर भी काम जारी है।
राज्य के चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों में 48 संवेदनशील स्थलों की पहचान की गई है, जहां विशेष निगरानी रखी जा रही है। वहीं, भूस्खलन और मलबा बहाव जैसी समस्याओं से निपटने के लिए एक संयुक्त समिति भी सक्रिय रूप से काम कर रही है।
सरकार का मानना है कि इन कदमों से आपदा के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकेगा और समय रहते लोगों को सुरक्षित किया जा सकेगा।
