सरोवर नगरी नैनीताल सहित पूरे उत्तराखंड में आज भी ‘भिटौली’ की प्राचीन परंपरा पूरे उत्साह और भावनात्मक जुड़ाव के साथ निभाई जाती है। यह परंपरा खासतौर पर चैत महीने में विवाहित बेटियों को उनके मायके की ओर से उपहार देने से जुड़ी है, जो परिवार के प्रेम और स्नेह का प्रतीक मानी जाती है।
डीएसबी कॉलेज के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर ललित तिवारी ने एक विशेष बातचीत में बताया कि भिटौली उत्तराखंड की अत्यंत पुरानी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध परंपरा है। इसमें माता-पिता और भाई अपनी विवाहित बेटी या बहन के लिए वस्त्र, पकवान और उपहार लेकर उसके ससुराल जाते हैं।
भिटौली का सांस्कृतिक महत्व
भिटौली केवल एक रस्म नहीं, बल्कि परिवारों के बीच भावनात्मक जुड़ाव का माध्यम है। इस दौरान बेटी अपने मायके से आए उपहारों को अपने ससुराल और आसपास के लोगों में बांटती है, जिससे खुशी और अपनापन और बढ़ता है।
‘साई’ पकवान की खास पहचान
भिटौली के अवसर पर एक पारंपरिक पकवान ‘साई’ बनाया जाता है। इसे चावल को पीसकर, भूनकर और उसमें मिठास मिलाकर तैयार किया जाता है। यह पकवान इस पर्व की खास पहचान माना जाता है।
परंपरा के पीछे की कहानी
प्रोफेसर तिवारी के अनुसार, पहले के समय में संचार के साधन सीमित थे और विवाहित बेटियों का ससुराल अक्सर दूर-दराज़ क्षेत्रों में होता था। ऐसे में परिवार साल में कम से कम एक बार बेटी से मिलने और उसकी कुशलक्षेम जानने के लिए भिटौली जैसी परंपरा का पालन करते थे।
आज भले ही मोबाइल और इंटरनेट के जरिए पल-पल की खबर मिल जाती है, लेकिन भिटौली जैसी परंपराएं आज भी रिश्तों की गर्माहट को जीवित रखे हुए हैं।
बदलते समय में भी कायम परंपरा
आज यह पर्व केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अन्य राज्यों में भी लोग इसे अपनाने लगे हैं। यह परंपरा दर्शाती है कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, परिवार और प्रेम की भावना हमेशा बनी रहती है।
